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उपासकों के सान्निध्य में सिन्धीकेला में श्रद्धा एवं आध्यात्मिक उल्लास के साथ मनाया गया पर्युषण पर्व का महान पर्व संवत्सरी


सिन्धीकेला (कोशल प्रहरी) तेरापंथ सभा सिन्धीकेला के तत्वावधान में आचार्यश्री महाश्रमणजी के इंगित एवं मार्गदर्शन में पर्युषण पर्व की आराधना श्रद्धा, साधना, तप एवं आत्मचिंतन के साथ संपन्न हुई। कोलकाता से पधारे श्री इन्द्रजमलजी नहाटा एवं श्री निर्मलजी सुराणा उपासकों का पूरे पर्युषण पर्व के दौरान विशेष सान्निध्य प्राप्त हुआ। दोनों उपासकों ने पर्युषण पर्व को सार्थक एवं प्रभावी बनाने के लिए अथक परिश्रम, पूर्ण समर्पण और निरंतर सेवा-भाव के साथ अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रतिदिन धार्मिक कार्यक्रमों में सक्रिय रहते हुए उन्होंने अपनी मधुर वाणी, सरल शैली और प्रेरणादायी मार्गदर्शन से श्रावक-श्राविकाओं में धर्म के प्रति विशेष उत्साह का संचार किया। उनके प्रवचनों एवं साधनामय जीवनशैली से समाज के प्रत्येक वर्ग को प्रेरणा मिली। पर्युषण के प्रत्येक दिवस को आध्यात्मिक रूप से समृद्ध बनाने में दोनों उपासकों का विशेष योगदान रहा। खाद्य संयम दिवस, स्वाध्याय दिवस, सामयिक दिवस, जप दिवस, ध्यान दिवस एवं अणुव्रत चेतना दिवस के माध्यम से उन्होंने संयम, स्वाध्याय, सामयिक, मंत्र-जप, ध्यान, आत्मचिंतन एवं अणुव्रतों की महत्ता को सहज एवं प्रभावी ढंग से समझाया। जप दिवस पर मंत्र-जप एवं साधना की प्रेरणा दी गई, वहीं ध्यान दिवस पर अंतर्मुखी साधना एवं आत्मनिरीक्षण के महत्व को समझाया गया। अणुव्रत चेतना दिवस पर जीवन में छोटे-छोटे संकल्पों के माध्यम से नैतिकता एवं संयम को अपनाने की प्रेरणा दी गई। सामयिक दिवस पर प्रतिकूल मौसम के बावजूद श्रावकों ने गुरुदेव के इंगित को स्वीकार करते हुए श्रावक भवन पहुंचकर सामयिक की।

तपस्या एवं पौषध में भी दिखा उत्साह

पर्युषण पर्व के दौरान समाज में तप, त्याग और साधना की विशेष भावना देखने को मिली। इस दौरान कुल 27 पौषध हुए तथा लगभग 200 उपवास की तपस्या संपन्न हुई। इतनी बड़ी संख्या में पौषध एवं उपवास होना समाज की धर्मनिष्ठा, साधना के प्रति समर्पण और उपासकों के प्रेरणादायी मार्गदर्शन का सुंदर उदाहरण रहा। दोनों उपासकों ने तपस्वियों का उत्साहवर्धन करते हुए उनकी साधना की अनुमोदना की तथा तप एवं त्याग के आध्यात्मिक महत्व को समझाया। उनके निरंतर प्रोत्साहन से श्रावक-श्राविकाओं में साधना के प्रति विशेष उमंग देखने को मिली।

उपासकों की सेवाएं बनीं विशेष प्रेरणा

श्री इन्द्रजमलजी नहाटा एवं श्री निर्मलजी सुराणा ने पूरे पर्युषण काल में जिस निष्ठा और श्रम के साथ अपनी सेवाएं दीं, वह समाज के लिए विशेष रूप से प्रेरणादायी रहा। दोनों उपासकों ने केवल प्रवचन एवं धार्मिक कार्यक्रमों तक स्वयं को सीमित न रखते हुए श्रावक-श्राविकाओं से व्यक्तिगत संवाद कर उनकी जिज्ञासाओं का समाधान किया और साधना के लिए प्रोत्साहित किया। उनकी सरलता, विनम्रता, अनुशासन, मधुर व्यवहार और निरंतर सक्रियता ने सभी को प्रभावित किया। सुबह से लेकर कार्यक्रमों के समापन तक उनकी सक्रियता और धर्मकार्य के प्रति समर्पण स्पष्ट दिखाई देता रहा। उनके सान्निध्य से सिन्धीकेला में पर्युषण पर्व के दौरान ऐसा आध्यात्मिक वातावरण बना, जिसमें धर्म, तप, स्वाध्याय और साधना की भावना निरंतर प्रवाहित होती रही। समाज की ओर से दोनों उपासकों के प्रति हार्दिक कृतज्ञता एवं आभार व्यक्त किया गया।

संवत्सरी पर आत्मावलोकन और क्षमायाचना

पर्युषण पर्व का सबसे महत्वपूर्ण महान पर्व संवत्सरी श्रद्धा एवं भावपूर्ण वातावरण में मनाया गया। इस अवसर पर श्रावक-श्राविकाओं ने वर्षभर में जाने-अनजाने में हुई भूलों का आत्मावलोकन करते हुए परस्पर क्षमायाचना की। उपासकों ने संवत्सरी के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए क्षमा, संयम, त्याग, तप एवं आत्मशुद्धि को जीवन में अपनाने की प्रेरणा दी। कार्यक्रम को सफल बनाने में महासभा आंचलिक प्रभारी छत्रपाल जैन सहित तेरापंथ सभा अध्यक्ष सुदर्शन जैन, मंत्री अनिल जैन, उपाध्यक्ष नबीन जैन , महिला मंडल अध्यक्षा लीला जैन, पूर्व अध्यक्षा पुष्पा जैन, मंत्री प्रिया जैन तथा युवक परिषद अध्यक्ष पीयूष जैन सहित सभा, महिला मंडल एवं युवक परिषद के सदस्यों का सक्रिय सहयोग रहा। इस प्रकार पर्युषण पर्व का समापन क्षमा, संयम, तप, साधना, आत्मचिंतन एवं आपसी सौहार्द के पावन संदेश के साथ हुआ। 27 पौषध और लगभग 200 उपवास सहित हुई व्यापक साधना ने इस पर्युषण पर्व को समाज के लिए एक स्मरणीय आध्यात्मिक अवसर बना दिया।

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